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Sunday, July 08, 2018

GHAZAL


ग़ज़ल


उन्हें नश्तर से दिल पे वार करना आता है
हमें भी अपने जख्म शुमार करना आता है

उनको न आना है तो न आएं मेरी बला से
मुझे क़यामत तक भी इंतज़ार करना आता है

बेलौस गुज़र जायेगा इश्क़ के तूफां से वो
आग का  दरिया उसे  पार करना आता है

बेवफाई शौक़ उनका और इश्क़ जुनूं मेरा
उन्हें ज़फ़ा तो मुझे प्यार करना आता है

भला दोस्तों का यक़ीन  क्यों न करता वो
जिसे रक़ीबों पे भी ऐतबार करना आता है

चमन को उजाड़ने का वे हुनर रखतें हैं और

हमें बयाबां को गुल- ए- गुलज़ार करना आता है

Thursday, June 21, 2018

Ghazal

एक ग़ज़ल


रहने दे अब, इतने ग़म का ब्यान काफी है
मेरे लिए तो इतनी ही दास्तान काफी है


नहीं दरकार शोलों को हवा देने की यहां
बस्तियां जलाने को उसकी ज़बान काफी है


जख्म-ए -दिल, चाक जिगर के अलावा भी
उस संगदिल का  मुझ पर एहसान काफी है


इलाज -ए -ग़म के बजाये जो दर्द बढ़ा देता है
ऐसे चारागर से मिलने का अरमान काफी है


तेरे फरेब के लाल-ओ-जवाहिर तुझे मुबारक हो  
मेरे लिए मेरा ज़मीर व मेरा ईमान काफी है


हुईं सदियाँ इस कब्र में सोये हुए ऐ अब्द
लेकिन अभी भी ज़ीस्त की थकान काफी है


Saturday, June 02, 2018

Ek Ghazal

ग़ज़ल


ज़िंदा अपने सोये हुए जज़्बात किया कर
जुबां है तेरे पास हक़ की बात किया कर

यूँ तो मिलते रहते हो सारी दुनिया से तुम
खुद से भी तो कभी मुलाकात किया कर

अकेले इंक़लाब नहीं आता ऐ मेहनतकशों  
जो भी करना है मिलके सब साथ किया कर

हो कशीदगी कम और चलन प्यार का बढ़े
तू मुल्क में पैदा कुछ ऐसे हालात किया कर

अहले दौलत पर तेरी मेहरबानियां है बहुत
मुफ़लिसों को भी तो कुछ इनायात किया कर

कैसे जीते हैं लोग बस्तियों में ये जानना है अगर

तो निकल महल से और सड़कों पे रात किया कर

Saturday, May 26, 2018

EK GHAZAL


ग़ज़ल

प्यार बहुत कुछ, पर जान से बढ़ के थोड़े है
है दौलत ज़रूरी, पर ईमान से बढ़ के थोड़े है

तख़्त-ओ-ताज, लाल-ओ -जवाहिर चाहिए मुझे
ये सब लेकिन तेरी  मुस्कान से बढ़ के थोड़े है

सुना है बड़ा शानो शौक़त है साहब-ए -मसनद का
मगर उनका जलवा , खुदा की शान से बढ़के थोड़े है

काशी, काबा या हो कलीसा, सब अपनी जगह हैं
इनकी क़ीमत मगर किसी इंसान से बढ़के थोड़े है

माना की  हवा से बातें करती हैं उसके महल की मीनारें
लेकिन उसकी बुलन्दी इस आसमान से बढ़के थोड़े है

वैसे तो  पढ़ा है मैंने खुसरो,ज़ौक़ और ग़ालिब को  भी
लेकिन उनकी तहरीरें ‘अब्द’ के दीवान से बढ़के थोड़े है





Sunday, May 06, 2018

A NEW GHAZAL


झूठी  वतन परस्ती का यह कारोबार बंद करो
वहशत की तिज़ारत,नफ़रत का बाजार बंद करो


देखो झुलस रहीं हैं  कलियाँ कितनी चमन में
साथ लाये हो  जो,वो मौसम-ए -बहार बंद करो


तेरे इश्क़ से तेरी हमदर्दी से परेशां हैं बहुत लोग
अपना ये झूठा दिखवा ये अपना प्यार बंद करो


मैं जनता हूँ की नहीं है उल्फत तुमको मुझ से
खुदा के वास्ते ये बार बार का इज़हार बंद करो


तेरे फरेब का सलीका है शानदार ,सुभानअल्लाह
चलो मैं तुमसे हार  गया, अब ये तकरार बंद करो


शहर पे  पूरा कब्ज़ा है अब शब-ए -ज़ुल्मात का
अब्द नहीं आएगी वो सहर  इंतज़ार बंद करो

Sunday, April 15, 2018

SUNDAY GHAZAL

ग़ज़ल 



Faile huye sehra mein sarab sa hai                                            फैले    हुए   सेहरा  में   सराब  सा  है 
Mera wazood bas ek   khawab sa hai                                        मेरा   वज़ूद  बस  एक ख़्वाब  सा  है 

Har lafz unka hai  muamaa jaisa                                             हर  लफ़्ज़  उनका है मुअम्मा 
 जैसा 
Unka harek sawal to jawab sa hai                                           उनका  हरेक  सवाल  तो जवाब सा है 

Jaam nahin,lahu insano ka hai ye                                          जाम  नहीं  लहू  इंसानो  का है ये 
Rang iska bhale kuchh sharab sa hai                                    रंग इसका भले कुछ शराब सा है
 
 Dahakta hua aatish fishan  hai wo                                        दहकता  हुआ आतिश फ़िशां  है वो 
Chehra magar 
 uska ek
 gulab sa hai 
                                   चेहरा मगर 
उसका  एक 
गुलाब सा है 

Chandni raat hai , phir bhi teergi har taraf                      चांदनी रात है फिर भी तीरगी हर तरफ 
Chand ke rukh pe abr k  hizab sa hai                                 चाँद के रुख पे अब्र का  हिज़ाब सा है 





Sunday, April 08, 2018

GHAZAL



हर   शाख़ पे फूल नहीं,  ख़ार ही ख़ार चाहिए
हाकिम-ए-शहर को नहीं गुल-ए-गुलज़ार चाहिए


जिस्म  वो जां  तो उसने खरीद लिया कब का
अब  उसे दिल  पे भी पूरा  अख्तियार चाहिए


खुले  हैं मुल्क  में वहशत के  कारखाने कितने
और  तुमको  अब भी कोई  रोज़गार चाहिए


दिल  तोड़ने  का हर एक नुख्सा है हमारे पास
लेकिन तुम्हें  तो दिल जोड़ने काऔज़ार चाहिए


नफरत की बारिशों का भी मजा लीजिए ज़रा  
क्यों तुम्हे मोहब्बत की एक ठंडी फुहार चाहिए


पहले तो दावत ए चमन दिया ख़िज़ाँ को तुमने
अब  ये कहते  हो की मौसम ए बहार चाहिए


फुर्सत और आराम  सब अमीरों के चोचले  हैं

अब्द  तुम्हें  क्यों हफ्ते  में एक इतवार चाहिए



Saturday, March 31, 2018

A New Ghazal

ग़ज़ल


उल्फत झलक रही है चश्म-ए -पुर-आब  में
पर  इंकार  भी छुपा  है उसके जवाब  में


कैसे  आज उसने  पहचाना नहीं    मुझे
कल ही मिले थे हम तो उससे  ख़्वाब में


हर  सांस का हिसाब  रहता है उसके पास
ये वक्त  बड़ा माहिर है इल्म-ए -हिसाब  में


क्या कहूँ कितना उसके बोसे में है  सुरूर
मस्ती  कहां मिलेगी मुझे उतनी  शराब में


किस में ताब-ए -नज़ारा है ऐसे जमाल का
इसलिए  तो आएं  हैं वो यहाँ पे नक़ाब में


धड़कन ये चल पड़ी जब उसने मुझे  छुआ
कुछ अक्सीर सा असर है उसके शबाब में


गर   देखूं  तो होश गुम न देखूं तो  बेकली
अल्लाह जाने फंस  गया हूं किस अज़ाब में






Thursday, March 29, 2018

A NEW GHAZAL


ग़ज़ल


दिल मे मेरे बस  एक नन्हा सा ख़्वाब था
उस ख्वाब की आँखों में दर्द बेहिसाब था

गैरों से लेकर नूर चमकता फिरे है जो
रोशन फलक पर कल वही माहताब था

मेरे ही खत टुकड़े लिफाफे में मिले मुझको
मेरी वफ़ा का उनका कुछ ऐसा जवाब था

दिया ज़ख्म जो भी उसने मैंने लिया ख़ुशी से
मैं जानता था उसका कुछ बाक़ी हिसाब था

बहुत दूर तक था ये ज़ुल्मत का सिलसिला
चाँद ने चेहरे पे फिर से डाला नक़ाब था

अपनी खलिश को लेकर पहुंचे जहाँ पर ‘अब्द”
माहौल उस महफ़िल का भी पुर-इज़्तिराब था





Saturday, November 18, 2017

EK GHAZAL

ऐय्यारी को क्यों मैं शराफत समझता रहा
तिज़ारत था वो  मैं मुहब्बत समझता रहा

तग़ाफ़ुल को उनके न पढ़ पाया अबतक  मैं
उनकी बेरुख़ी को  उनकी  नज़ाकत समझता रहा

उनकी  बेवफाई के किस्से मशहूर तो थे पर
उन किस्सों को रक़ीबों की शरारत समझाता रहा

इश्क़ का इज़हार भी ऐसा किया  महबूब ने
प्यार के इक़रार को  एक अदावत समझता रहा

झूठ का अंदाज़ भी इतना हसीं था जनाब का
उनके हर फ़रेब को मैं तो सदाकत समझता रहा

उनके लिए दिल का लगाना एक खेल था और
मैं अपने इश्क़ को  बस एक इबादत समझाता रहा





Saturday, May 13, 2017

GHAZAL

मेरी आँखों में ख्वाबें तमाम बाक़ी है
लबों पे अब भी तेरा नाम बाक़ी है

''अय्याम-ए-जुदाई'' का सितम देख लिया मैंने
लेकिन अभी तो हिज़्र  की शाम बाक़ी है

दिल पे चलाओ खूब नश्तर हमदम
मेरी वफाओं का अभी सारा इनाम बाक़ी है

पीया मैने ना जाने ज़हर के प्याले  कितने
मेरे सामने अब ये आखरी जाम बाक़ी है

वो आएँ तो पूछूँ  ज़रा, ख़ता क्या थी मेरी
मरने के पहले इतना सा काम बाक़ी है

ना कर जल्दी, ठहर जा ऐ  दरकश तू  ज़रा
हकीम-ए- मक़तल का अभी सलाम बाक़ी है



Monday, March 13, 2017

GHAZAL

ग़ज़ल 


दस्तूर-ए -वफ़ा निभाता तो मैं निभाता कैसे 
पा बाजौलां था ,तेरे दर आता तो आता कैसे 

एक शीशे की दीवार थी हमारे दरम्यां पोशीदा सी 
हाल -ए -दिल आखिर मैं  बताता तो बताता कैसे 

छुपा रखा था एक मुजस्समा महबूब का उसमे 
अपने दिल को आग में जलाता तो जलाता कैसे 

लबों पे शिकन थी और ज़बां पे पड़े थे छाले 
उनको देखकर मुस्कुराता तो मुस्कुराता कैसे 

 वहीँ पे मिलने का किया था वादा उसने सदियों पहले 
उस बयाबां  मैं  गर लौट के आता तो आता कैसे 


संग-ए -मर भी था, संग तराशी का हुनर भी था मुझमें 
पर मुमताज़ न थी तो ताजमहल बनाता तो बनाता कैसे 

लफ्ज़ पे व जुमलो पे लगा दी थी पाबन्दी उस ने 
फिर दास्तान अपनी मैं सुनाता तो सुनाता कैसे 

जब अज़ल ने ही  इंकार कर दिया मेरे क़रीब आने से 
 अपनी हस्ती को मैं ख़ाक में मिलाता तो मिलाता कैसे 

शोख़ हवाओं ने बता दी तेरी ज़फ़ा किस्से सब को 
 फिर ज़माने से ये बातें  मैं छुपाता तो छुपाता कैसे 







Sunday, March 12, 2017

Ghazal

ग़ज़ल 

अपने बेताब अरमानों को उसके रुबरु किया मैने
आज कुछ  इस तरह से उस से गुफ्तगू किया मैने

लफ़्ज़ों के खंज़र से जिगर चाक किया फिर उसने
और सब्र के धागों से फिर से दिल का रफू किया मैने

तल्खियाँ सारी भूल गया मैं रात के गुज़रते गुज़रते
सहर होते ही उस से मिलने का फिर ज़ुस्तज़ू  किया मैने

उसने कहा की जाओ और डूब मरो दरिया में
उसकी जो ख्वाहिश थी वही हूबहू किया मैने

मयखाने के आदाब निभाए मैने  इस तरह से अब्द
के मयकदे  जब भी गया तो पहले वज़ू किया मैने  




Saturday, December 10, 2016

EK GHAZAL

हसरतों का अपने तू  हिसाब रखा कर
अपने पास ज़्यादा मत ख्वाब रखा कर 


क्यों होता  है  ख़फ़ा मेरे हर सवाल पे
मेरे सवालों का बस जवाब रखा कर


न बुझेगी ये तिशनगी मय से अब तो
ऐ शाकी, मेरे पैमाने में तू तेज़ाब रखा कर 


लब से ज्यादा तेरी निगाहों को ज़रुरत है
सुराही में नहीं, आँखों में तू आब रखा कर 


 ज़रा होशियार रहा कर इस शहर के लोगों से
यूँ न दरीचे  पे कभी अपना शबाब रखा कर 


   तवील है  सफर  तारीकियों  के समंदर का ऐ अब्द
 अपने दामन  में छुपा के एक
 आफ़ताब रखा कर

  


Sunday, November 06, 2016

GHAZAL

                एक ग़ज़ल 

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मैं तेरी हर इनायतों का  हिसाब रखता हूँ
दिल में खलिश, आँखों में आब रखता हूँ


नहीं कहता कुछ  भी हाकिम -ए-मक़तल से मैं
मगर उसके हर सवालों का जवाब रखता हूँ 


वैसे तो पीता  हूँ खून-ए-जिगर शब-ओ-रोज़ मैं
पर अपने मेज़ की दराज़ों  मे मैं शराब रखता हूँ


एक पुरानी सी जंग आलूदा संदूक है मेरे पास
इसी में सारे टूटे हुए अपने ख़्वाब  रखता हूँ


कैसे भरने दूँ  इसे, ये जख्म तो उसका दिया है
हर रोज़ सुबह अपने नासूरों पे तेज़ाब रखता हूँ

Main teri har inayaton ka  hisaab rakhta hoon
Dil mein khalish, ankhon mein aab rakhta hoon

Nahin kahta kuchh bhi hakim-e-maqtal se main
Magar uske har sawalon ka jawab rakhta hoon

Waise to peeta hoon khoon-e-jigar shab-o-roz main
Par apne mez ki darzon me main sharab rakhta hoon

Ek purani si jung alooda sandook hai mere pas
Isi mein sare toote huye apne khawab rakhta hoon

Kaise bharne doon ise, ye jakhm to uska diya hai
Har roz subah apne nasuron pe tezaab rakhta hoon

Sunday, October 30, 2016

GHAZAL

Zarra ban ke kainaat mein bikhar jane ko ji chahta hai
Na jaane kyon khud ki hasti ko mitane ko ji chahta hai


Patthar patthar jod ke ye ghar banaya tha kabhi maine
Per aaj  is ashiyaan ko aag lagane ko ji chahta hai


Baithoon kisi byanaban mein aur rota rahoon musalsal
Na ab kabhi bhi mera muskurane ko ji chahta hai

Meri ek awaz pe daura daura ayega zamana yahan
Lekin kisi bhi ko na bulane ko ji chahta hai

Tere hamnawai mein sukoon to hai bahut magar
Tum se hamesha ke liye bichad jane ko ji chahta hai

Ek nashtar se karoon apne jigar ke tukde hazar
Apne dil ke tukdon ko darya mein bahane ko ji chahta


Nahin rahna hai mujhe in iman walon ke sath ab to
Mera kisi sanam ke aage sir jhukaane ko ji chahta hai

Mere samne hai man-o-salwa bhi aur jaame-e-kauser bhi
Phir bhi bhooke pyase tadp ke mar jaane ko ji chahta hai


Hadon ki deewar ne ab tak mujhe rok rakha tha abd
Magar ab to had se aage gujar jane ko ji chahta hai


ज़र्रा  बन के कायनात  में बिखर जाने को जी चाहता है
ना जाने क्यों खुद की हस्ती को मिटाने को जी चाहता है


पत्थर  पत्थर जोड़ के ये घर बनाया था  कभी मैने
पर  आज  इस आशियाँ को आग लगाने को जी चाहता है


बैठूँ  किसी ब्याबां  में और रोता रहूं मुसलसल
ना अब कभी भी  मेरा मुस्कुराने को जी चाहता है

मेरी एक आवाज़ पे दौड़ा दौड़ाआएगा ज़माना यहाँ
लेकिन किसी भी को ना बुलाने को जी चाहता है

तेरे हमनवाई में सुकून तो है बहुत मगर
तुम से हमेशा के लिए बिछड़ जाने को जी चाहता है

एक नश्तर से करूँ अपने जिगर के टुकड़े हज़ार
अपने दिल के टुकड़ों को दरिया  में बहाने को जी चाहता


नहीं रहना है मुझे इन ईमां  वालों के साथ अब तो
मेरा किसी सनम के आगे  सर  झुकाने को जी चाहता है

मेरे सामने है मन -ओ-सलवा भी और जामे-ए-कौसर भी
फिर भी भूखे प्यासे तड़प  के मर जाने को जी चाहता है


हदों की दीवार ने अब तक मुझे रोक रखा था अब्द
मगर अब तो हद से आगे  गुजर जाने को जी चाहता है

















Saturday, September 24, 2016

A NEW GHAZAL

Tere bose se shabnam shireen ho jaye
Hawa chuye tujhe to khushboo ho jaye

Teri hamnawai ki hasrat hai mujh ko
Dua karo ki puri ye arzoo ho jaye

Kal shab maine dekha ek khwab sa kuch
Kash uski tabeer bhi hoo bahoo ho jaye

Mit jaye zist ka har dard-o-alam yun hi
Jis pal, mehrbaan mujh pe tu ho jaye

Tera husn hai maninde aatishfishan lekin
Fana yaqeeni hai gar tu ru-ba-ru ho jaye

Sanam bezaar hai na jane kab se Abd
Khuda chahe to ishq mera surkhuru ho jaye









Tuesday, December 15, 2015

Yeh maikad-e-ishq hai yahan jaam-e-junoon milta hain

A NEW GHAZAL(With English Translation)
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Yeh maikad-e-ishq hai yahan  jaam-e-junoon milta hain
Giriya-e-deed-e-Qaisha wa  Qalb-e-laila ka khoon milta hai

Na batein hoti hai na deedar-e-rukhe-e yaar hota hai
Phir bhi is Mulqat-e-mukhtasar se kitna sukoon milta hai

Tisnagi, taghaful wa ek taweel si shab-e-tanhai, bas
Meri wafa meri mohabbat ka mujhe sila yoon milta hai








Wednesday, December 09, 2015

EK GHAZAL

ایک غزل  
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Zara is diwane ka arz-e-haal tum sunte kyon nahin
Ishq mein hota hai kya kamal tum sunte kyon nahin 


Dekh liya in ankho ko kya kya  gila hai tum se

Is dil ko bhi hai kuchh malal tum sunte kyon nahin


Dastan-e-urooz to suna hai tum ne barha magar

Kaise hua is qaum ka jawal tum sunte kyon nahin


Wo waqt tha wasl-e-yaar ka  us ka byan chhhodo

Hizr mein guzra hai kaise saal tum sunte kyon nahin


Taqreer bahut achhi hai tumhari ye sab mante hain

Yahan  mera bhi hai kuchh khyal tum sunte kyon nahin


Tere naam pe ho raha hai zulm-o-jabr, aye Khuda

 Insaniyat ho rahi hai pamaal, tum sunte kyon nahin

تیرے نام پے  ہو رہا ہے ظلم جبر  اے خدا 
انسانیت ہورہی  ہے  پامال تم سنتے کیوں نہیں  

Sunday, December 06, 2015

EK TAZA GHAZAL



Chup kyon ho tum jawaab to do

Mere jakhmo ka zara hisaab to do



Ukta gaya hoon jaam-e-giriya pee pee kar  [
jaam-e-giriya=wine of tears]

Zahar na sahi, thoda sharab to do


Tabeer ki batein phir karenge hum   { Tabeer=interpretation, explanation, elucidation of a dream]

Pahle in ankhon ko kuchh khawab to do



Kuchh to de jao apni nishani hum-dum

Dil ko khalish, nigahon ko aab to do



Jo kitab ke safon ke beech hai chhupa

Mujhe wapas  wo sukha hua gulab to do



Tweel hai safar zulmaton ka, aye Khuda    {Tweel=Long} {Zulmaton=Darkness]

Meri andheri raton ko ek mahtaab to do  [Mahtab=Moon]