Saturday, June 02, 2018

Ek Ghazal

ग़ज़ल


ज़िंदा अपने सोये हुए जज़्बात किया कर
जुबां है तेरे पास हक़ की बात किया कर

यूँ तो मिलते रहते हो सारी दुनिया से तुम
खुद से भी तो कभी मुलाकात किया कर

अकेले इंक़लाब नहीं आता ऐ मेहनतकशों  
जो भी करना है मिलके सब साथ किया कर

हो कशीदगी कम और चलन प्यार का बढ़े
तू मुल्क में पैदा कुछ ऐसे हालात किया कर

अहले दौलत पर तेरी मेहरबानियां है बहुत
मुफ़लिसों को भी तो कुछ इनायात किया कर

कैसे जीते हैं लोग बस्तियों में ये जानना है अगर

तो निकल महल से और सड़कों पे रात किया कर

Thursday, May 31, 2018

EK GHAZAL

एक ग़ज़ल 
मोहब्बत का सुरूर, इश्क़ का ख़ुमार बुरा लगता है। 
नफरत का चलन हो तो ये प्यार बुरा लगता है ।

अब तो आदत सी हो गयी है तौहीन की मुझको 
अंदाज़-ए- तग़ाफ़ुल  से बस एक बार बुरा लगता है 

जिनका पेशा है बस्तियों और शहरों को वीरां करना 
उन हज़रात को मौसम -ए -बहार बुरा लगता है 

जो ख़ार का व्योपार करतें हैं जीने के लिए 
उन्हें गुलशन का गुल -ए -गुलज़ार बुरा लगता है 

धोका और फरेब यहां  तहज़ीब का हिस्सा है 
ऐय्यारों के शहर में लफ्ज़ ऐतबार बुरा लगता है 

भूक और  प्यास की शिद्दत से कोई हो परेशां तो उसे 
चांदनी रात बुरी लगती है वस्ले यार बुरा लगता है 

क़त्ल होना ‘अब्द’ उतना  बुरा नहीं है लेकिन 
दारकश का एक लम्बा इंतज़ार बुरा लगता है












Saturday, May 26, 2018

EK GHAZAL


ग़ज़ल

प्यार बहुत कुछ, पर जान से बढ़ के थोड़े है
है दौलत ज़रूरी, पर ईमान से बढ़ के थोड़े है

तख़्त-ओ-ताज, लाल-ओ -जवाहिर चाहिए मुझे
ये सब लेकिन तेरी  मुस्कान से बढ़ के थोड़े है

सुना है बड़ा शानो शौक़त है साहब-ए -मसनद का
मगर उनका जलवा , खुदा की शान से बढ़के थोड़े है

काशी, काबा या हो कलीसा, सब अपनी जगह हैं
इनकी क़ीमत मगर किसी इंसान से बढ़के थोड़े है

माना की  हवा से बातें करती हैं उसके महल की मीनारें
लेकिन उसकी बुलन्दी इस आसमान से बढ़के थोड़े है

वैसे तो  पढ़ा है मैंने खुसरो,ज़ौक़ और ग़ालिब को  भी
लेकिन उनकी तहरीरें ‘अब्द’ के दीवान से बढ़के थोड़े है





Thursday, May 24, 2018

लघुकथा : Storiette

शहर के एक चौराहे पर कुछ हिन्दू और चंद मुसलमान। बहस का मुद्दा है ‘कौन सा धर्म इंसनियत , प्यार और  अमनपसन्दी’ को सब से ज्यादा अहमियत देता है। बात आगे बढ़ती गयी और शहर में दंगा हो गया।

Sunday, May 06, 2018

A NEW GHAZAL


झूठी  वतन परस्ती का यह कारोबार बंद करो
वहशत की तिज़ारत,नफ़रत का बाजार बंद करो


देखो झुलस रहीं हैं  कलियाँ कितनी चमन में
साथ लाये हो  जो,वो मौसम-ए -बहार बंद करो


तेरे इश्क़ से तेरी हमदर्दी से परेशां हैं बहुत लोग
अपना ये झूठा दिखवा ये अपना प्यार बंद करो


मैं जनता हूँ की नहीं है उल्फत तुमको मुझ से
खुदा के वास्ते ये बार बार का इज़हार बंद करो


तेरे फरेब का सलीका है शानदार ,सुभानअल्लाह
चलो मैं तुमसे हार  गया, अब ये तकरार बंद करो


शहर पे  पूरा कब्ज़ा है अब शब-ए -ज़ुल्मात का
अब्द नहीं आएगी वो सहर  इंतज़ार बंद करो

Sunday, April 15, 2018

BOOK REVIEW



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IN SHORT BOOKS


Peace has Come by Parismita Singh 

Peace has Come by Parismita Singh reviewed by Abdullah Khan
MORE-IN

Ordinary people try to lead their lives in extraordinary times

In this achingly good collection of short stories by Parismita Singh, each of the eight tales unravels in a part of upper Assam which is also often referred to as ‘Bodoland’. The word ‘Peace’ in the title refers to a period of ceasefire between the government and the Bodo rebels.
Living in a post 9/11 world, we well understand the meaning of ‘collateral damage’, but we seldom realise that ‘ceasefire’ also claims its share of victims, and like a war, it also comes with collateral damage. Through her stories, Singh tells us how common people suffer during “the uneasy, purgatory like time of ceasefire”, which is really no better than wartime.
The stories are about the extraordinary efforts of ordinary people to lead normal lives in troubled times. In the opening story, ‘A Time Made of Glass’, we meet Rwmaii and Sylvia, who are in love with each other. Their love story comes to an abrupt end when Sylvia is married off to a powerful militant leader. Later, they plan to elope, but Rwmaii realises that Sylvia’s husband can easily harm his family and decides to forsake Sylvia.
The plotlines are often predictable. But Singh’s uniqueness lies in the way she carves out her characters, looking deep into their heart and minds, so that readers immediately empathise with them.
Whether they are Bodos, Nepalis, Bengalis, Koch-Rajbongshis, Rabhas, Muslims or Santalis, every ethnic and religious group suffers in the socio-political turmoil happening around them. And despite their cultural differences, their pain and daily struggles are alike.
Most of them don’t understand politics until someone explains it to them. Their powerlessness in the face of forces beyond their control makes them one with residents of war-ravaged zones across the world.
Even while the stories evoke compassion, Singh maintains a steady distance from her characters. She describes their lives in exquisite detail, like a documenter. At places, however, the descriptions drag on and in some stories the stage seems overcrowded.
The Mumbai-based screenwriter and critic’s first novel Patna Blues will be published later this year.
http://www.thehindu.com/books/peace-has-come-by-parismita-singh-reviewed-by-abdullah-khan/article23523841.ece

SUNDAY GHAZAL

ग़ज़ल 



Faile huye sehra mein sarab sa hai                                            फैले    हुए   सेहरा  में   सराब  सा  है 
Mera wazood bas ek   khawab sa hai                                        मेरा   वज़ूद  बस  एक ख़्वाब  सा  है 

Har lafz unka hai  muamaa jaisa                                             हर  लफ़्ज़  उनका है मुअम्मा 
 जैसा 
Unka harek sawal to jawab sa hai                                           उनका  हरेक  सवाल  तो जवाब सा है 

Jaam nahin,lahu insano ka hai ye                                          जाम  नहीं  लहू  इंसानो  का है ये 
Rang iska bhale kuchh sharab sa hai                                    रंग इसका भले कुछ शराब सा है
 
 Dahakta hua aatish fishan  hai wo                                        दहकता  हुआ आतिश फ़िशां  है वो 
Chehra magar 
 uska ek
 gulab sa hai 
                                   चेहरा मगर 
उसका  एक 
गुलाब सा है 

Chandni raat hai , phir bhi teergi har taraf                      चांदनी रात है फिर भी तीरगी हर तरफ 
Chand ke rukh pe abr k  hizab sa hai                                 चाँद के रुख पे अब्र का  हिज़ाब सा है 





Sunday, April 08, 2018

GHAZAL



हर   शाख़ पे फूल नहीं,  ख़ार ही ख़ार चाहिए
हाकिम-ए-शहर को नहीं गुल-ए-गुलज़ार चाहिए


जिस्म  वो जां  तो उसने खरीद लिया कब का
अब  उसे दिल  पे भी पूरा  अख्तियार चाहिए


खुले  हैं मुल्क  में वहशत के  कारखाने कितने
और  तुमको  अब भी कोई  रोज़गार चाहिए


दिल  तोड़ने  का हर एक नुख्सा है हमारे पास
लेकिन तुम्हें  तो दिल जोड़ने काऔज़ार चाहिए


नफरत की बारिशों का भी मजा लीजिए ज़रा  
क्यों तुम्हे मोहब्बत की एक ठंडी फुहार चाहिए


पहले तो दावत ए चमन दिया ख़िज़ाँ को तुमने
अब  ये कहते  हो की मौसम ए बहार चाहिए


फुर्सत और आराम  सब अमीरों के चोचले  हैं

अब्द  तुम्हें  क्यों हफ्ते  में एक इतवार चाहिए



Saturday, March 31, 2018

A New Ghazal

ग़ज़ल


उल्फत झलक रही है चश्म-ए -पुर-आब  में
पर  इंकार  भी छुपा  है उसके जवाब  में


कैसे  आज उसने  पहचाना नहीं    मुझे
कल ही मिले थे हम तो उससे  ख़्वाब में


हर  सांस का हिसाब  रहता है उसके पास
ये वक्त  बड़ा माहिर है इल्म-ए -हिसाब  में


क्या कहूँ कितना उसके बोसे में है  सुरूर
मस्ती  कहां मिलेगी मुझे उतनी  शराब में


किस में ताब-ए -नज़ारा है ऐसे जमाल का
इसलिए  तो आएं  हैं वो यहाँ पे नक़ाब में


धड़कन ये चल पड़ी जब उसने मुझे  छुआ
कुछ अक्सीर सा असर है उसके शबाब में


गर   देखूं  तो होश गुम न देखूं तो  बेकली
अल्लाह जाने फंस  गया हूं किस अज़ाब में






Thursday, March 29, 2018

A NEW GHAZAL


ग़ज़ल


दिल मे मेरे बस  एक नन्हा सा ख़्वाब था
उस ख्वाब की आँखों में दर्द बेहिसाब था

गैरों से लेकर नूर चमकता फिरे है जो
रोशन फलक पर कल वही माहताब था

मेरे ही खत टुकड़े लिफाफे में मिले मुझको
मेरी वफ़ा का उनका कुछ ऐसा जवाब था

दिया ज़ख्म जो भी उसने मैंने लिया ख़ुशी से
मैं जानता था उसका कुछ बाक़ी हिसाब था

बहुत दूर तक था ये ज़ुल्मत का सिलसिला
चाँद ने चेहरे पे फिर से डाला नक़ाब था

अपनी खलिश को लेकर पहुंचे जहाँ पर ‘अब्द”
माहौल उस महफ़िल का भी पुर-इज़्तिराब था